श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.12.56 
दीनयाऽऽतुरया वाचा इति होवाच कैकयीम्।
अनर्थमिममर्थाभं केन त्वमुपदेशिता॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उन्होंने कैकेयी से करुण एवं चिन्ताग्रस्त स्वर में कहा - 'हाय! यह तो तुम्हें अनर्थ ही प्रतीत होता है। किसने तुम्हें यह उपदेश दिया है?'॥56॥
 
Thereafter he addressed Kaikeyi in a pitiable and anxious voice - 'Oh! This seems like a disaster to you. Who has preached this to you?॥ 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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