श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.12.55 
नष्टचित्तो यथोन्मत्तो विपरीतो यथातुर:।
हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपति:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
उनकी चेतना लुप्त हो गई थी। वे उन्मत्त से प्रतीत हो रहे थे। उनका स्वभाव बदल गया था। वे रोगी से प्रतीत हो रहे थे। इस प्रकार राजा दशरथ उस सर्प के समान निश्चल हो गए, जिसका तेज मंत्र द्वारा हर लिया गया हो ॥ 55॥
 
His consciousness seemed to have vanished. He appeared to be in a frenzy. His nature changed. He appeared to be sick. Thus King Dasharath became motionless like a snake whose glory has been taken away by a mantra. ॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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