| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना » श्लोक 51-52 |
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| | | | श्लोक 2.12.51-52  | श्रुत्वा तु राजा कैकेय्या वाक्यं परमशोभनम्।
रामस्य च वने वासमैश्वर्यं भरतस्य च॥ ५१॥
नाभ्यभाषत कैकेयीं मुहूर्तं व्याकुलेन्द्रिय:।
प्रैक्षतानिमिषो देवीं प्रियामप्रियवादिनीम्॥ ५२॥ | | | | | | अनुवाद | | कैकेयी के ये अशुभ वचन सुनकर, 'श्रीराम को वनवास और भरत का राज्याभिषेक हो', राजा की सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गईं। उन्होंने एक क्षण भी कैकेयी से कुछ नहीं कहा। वे उस प्यारी रानी को देखते रहे जिसने वे अप्रिय वचन कहे थे। | | | | Hearing these inauspicious words from Kaikeyi, 'Shri Ram should be sent to exile and Bharat should be crowned', all the senses of the king became restless. He did not speak to Kaikeyi for a moment. He kept staring at the lovely queen who had spoken those unpleasant words. | | ✨ ai-generated | | |
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