श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  2.12.49 
भरतेनात्मना चाहं शपे ते मनुजाधिप।
यथा नान्येन तुष्येयमृते रामविवासनात्॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
'हे मनुष्यों के स्वामी! मैं आपके सामने अपनी और भरत की शपथ लेता हूँ कि भगवान राम को इस देश से निकालने के अतिरिक्त मुझे किसी भी अन्य बात से संतोष नहीं होगा।'
 
'O Lord of men! I swear in front of you on myself and Bharat that I will not be satisfied with anything other than expelling Lord Rama from this country.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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