श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  2.12.48 
एकाहमपि पश्येयं यद्यहं राममातरम्।
अञ्जलिं प्रतिगृह्णन्तीं श्रेयो ननु मृतिर्मम॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं एक दिन भी राम की माता कौशल्या को राजमाता के रूप में दूसरों को हाथ जोड़कर प्रणाम करते देखूँ, तो मैं मर जाना ही श्रेयस्कर समझूँगा ॥48॥
 
If for even a day I see Rama's mother Kausalya making other people fold their hands in respect to her in her capacity as the queen mother, then I would consider it better to die. ॥ 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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