श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.12.46 
भवत्वधर्मो धर्मो वा सत्यं वा यदि वानृतम्।
यत्त्वया संश्रुतं मह्यं तस्य नास्ति व्यतिक्रम:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
'अब चाहे वह धर्म हो या अधर्म, झूठ हो या सच, जो कुछ भी आपने मुझे वचन दिया है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता ॥ 46॥
 
'Now whether it is Dharma or Adharma, lie or truth, whatever you have promised me, there can be no change in it. ॥ 46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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