श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.12.44 
सागर: समयं कृत्वा न वेलामतिवर्तते।
समयं मानृतं कार्षी: पूर्ववृत्तमनुस्मरन्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
समुद्र ने (देवताओं के समक्ष) प्रतिज्ञा की थी कि वह अपनी निश्चित सीमा का उल्लंघन नहीं करेगा, अतः अब तक उसने उसका उल्लंघन नहीं किया है। तुम भी पूर्वकाल के महापुरुषों के आचरण को सदैव स्मरण रखो और अपनी प्रतिज्ञा को कभी मिथ्या न करो॥ 44॥
 
‘The ocean had pledged (before the gods) that it would not cross its fixed limits, so till now it has not violated it. You too should always keep in mind the behaviour of the great men of the past and never make your pledge false.॥ 44॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd