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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना
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श्लोक 35
श्लोक
2.12.35
पृथिव्यां सागरान्तायां यत् किंचिदधिगम्यते।
तत् सर्वं तव दास्यामि मा च त्वं मन्युमाविश॥ ३५॥
अनुवाद
'मैं तुझे पृथ्वी पर समुद्रपर्यन्त जो कुछ भी उपलब्ध है, वह सब दे दूँगा, परन्तु तू हठ न करना, क्योंकि इससे मैं मृत्यु के मुँह में जा पड़ूँगा॥35॥
'I will give you whatever is available on the earth up to the sea, but do not be obstinate, which will push me into the jaws of death.॥ 35॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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