श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.12.29 
सत्येन लोकाञ्जयति द्विजान् दानेन राघव:।
गुरूञ्छुश्रूषया वीरो धनुषा युधि शात्रवान्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
वीर श्री रामचन्द्रजी अपने सात्विक भावों से सम्पूर्ण लोकों को, दान से द्विजों को, सेवा से गुरुजनों को तथा युद्धस्थल में धनुष-बाण से शत्रु सैनिकों को जीतकर अपने वश में कर लेते हैं॥29॥
 
'The brave Shri Ramchandra conquers all the worlds with his sattvik sentiments, the dwijas by his donations, the teachers by his service and the enemy soldiers in the battlefield by his bow and arrow and brings them under his control. 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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