श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.12.28 
सान्त्वयन् सर्वभूतानि राम: शुद्धेन चेतसा।
गृह्णाति मनुजव्याघ्र: प्रियैर्विषयवासिन:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'पुरुषों के सिंह श्री रामजी शुद्ध हृदय से समस्त प्राणियों को सांत्वना देते हैं और अपने मधुर आचरण से राज्य की समस्त प्रजा को अपने वश में रखते हैं।॥28॥
 
'The lion of men, Shri Ram, consoles all beings with a pure heart and keeps all the subjects of the kingdom under his control by his pleasant conduct. ॥28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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