श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.12.20 
नहि किंचिदयुक्तं वा विप्रियं वा पुरा मम।
अकरोस्त्वं विशालाक्षि तेन न श्रद्दधामि ते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
‘विशालोचने! आज से पहले तुमने मेरे प्रति कभी कोई अनुचित या अप्रिय कार्य नहीं किया; इसीलिए आज जो तुम कह रही हो, उस पर मुझे विश्वास नहीं है।
 
‘Vishallochane! Before today you have never done anything that is inappropriate or unpleasant to me; that is why I do not believe what you are saying today.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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