| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना » श्लोक 14-15 |
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| | | | श्लोक 2.12.14-15  | तदलं त्यज्यतामेष निश्चय: पापनिश्चये॥ १४॥
अपि ते चरणौ मूर्ध्ना स्पृशाम्येष प्रसीद मे।
किमर्थं चिन्तितं पापे त्वया परमदारुणम्॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | अतः ऐसा वर माँगने से कोई लाभ नहीं है। हे पापमय संकल्प वाली कैकेयी! इस संकल्प या हठ को त्याग दो। लो, मैं अपना सिर तुम्हारे चरणों पर रखता हूँ, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ। हे पापिनी! तुमने ऐसी क्रूर बात क्यों सोची?॥14-15॥ | | | | ‘Therefore, there is no benefit in asking for such a boon. O Kaikeyi, who has sinful resolve, give up this resolve or obstinacy. Here, I place my head on your feet, be pleased with me. O sinner, why have you thought of such a cruel thing?॥ 14-15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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