| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना » श्लोक 110 |
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| | | | श्लोक 2.12.110  | क्षुरोपमां नित्यमसत्प्रियंवदां
प्रदुष्टभावां स्वकुलोपघातिनीम्।
न जीवितुं त्वां विषहेऽमनोरमां
दिधक्षमाणां हृदयं सबन्धनम्॥ ११०॥ | | | | | | अनुवाद | | तू प्राणघातक छुरी के समान है। तू मीठी बातें तो करता है, परन्तु वे सदा मिथ्या और शुभ भावना से रहित होती हैं। तेरे हृदय के भाव अत्यन्त अशुद्ध हैं और तू अपने कुल का भी नाश करने वाला है। इतना ही नहीं, तू मेरे प्राणों सहित मेरे हृदय को भी जलाकर भस्म कर देना चाहता है; इसीलिए तू मुझे प्रिय नहीं है। हे पापी, मैं तुझे जीवित नहीं देख सकता।॥110॥ | | | | ‘You are like a knife that kills. You speak sweetly, but they are always false and devoid of good intentions. The intentions of your heart are extremely impure and you are going to destroy your family as well. Not only this, you want to burn my heart along with my life to ashes; that is why you are not liked by me. I cannot bear you to be alive, sinner.॥110॥ | | ✨ ai-generated | | |
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