| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना » श्लोक 109 |
|
| | | | श्लोक 2.12.109  | प्रताम्य वा प्रज्वल वा प्रणश्य वा
सहस्रशो वा स्फुटितां महीं व्रज।
न ते करिष्यामि वच: सुदारुणं
ममाहितं केकयराजपांसने॥ १०९॥ | | | | | | अनुवाद | | हे केकयराज के कुल के कलंक! तू चाहे लज्जा से डूब मर, चाहे अग्नि में जलकर भस्म हो जा, चाहे विष खाकर प्राण त्याग दे, चाहे पृथ्वी में सहस्रों दरारें बनाकर उसमें विलीन हो जा; परन्तु मैं तेरी यह अत्यन्त कठोर सलाह, जो मुझे हानि पहुँचाने वाली है, कभी स्वीकार नहीं करूँगा॥109॥ | | | | 'Oh you living disgrace of the Kekaya king's family! You may drown yourself in shame or burn to ashes in fire or give up your life by consuming poison or create thousands of cracks in the earth and disappear into it; but I will never accept this extremely harsh advice of yours which will harm me.॥109॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|