श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  2.12.108 
न किंचिदाहाहितमप्रियं वचो
न वेत्ति राम: परुषाणि भाषितुम्।
कथं तु रामे ह्यभिरामवादिनि
ब्रवीषि दोषान् गुणनित्यसम्मते॥ १०८॥
 
 
अनुवाद
श्री राम कभी किसी को अहितकर या अप्रिय वचन नहीं कहते। वे कटु वचन बोलना नहीं जानते। अपने गुणों के कारण वे सदैव आदरणीय हैं। ऐसे सुन्दर वचन बोलने वाले श्री राम में तुम दोष कैसे ढूँढ़ सकते हो? क्योंकि वनवास तो उन्हीं को दिया जाता है जिनके अनेक दोष सिद्ध हो चुके हों॥108॥
 
‘Shri Ram never says any harmful or unpleasant words to anyone. He does not know how to speak harsh words. He is always respected due to his qualities. How can you find faults in Shri Ram who speaks such beautiful words? Because exile is given only to those whose many faults have been proven.॥ 108॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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