श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  2.12.107 
नृशंसवृत्ते व्यसनप्रहारिणि
प्रसह्य वाक्यं यदिहाद्य भाषसे।
न नाम ते तेन मुखात् पतन्त्यधो
विशीर्यमाणा दशना: सहस्रधा॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
हे क्रूर कैकेयी! तू संकटग्रस्त मनुष्य पर प्रहार कर रही है। हे! आज जब तू हठपूर्वक ऐसे कठोर वचन बोल रही है, तब तेरे दाँत सहस्त्रों टुकड़ों में टूटकर तेरे मुख से क्यों नहीं गिर पड़ते?॥107॥
 
‘O cruel Kaikeyi! You are attacking a person in trouble. Oh! When you say such harsh words with obstinacy today, why don't your teeth break into thousands of pieces and fall down from your mouth?॥107॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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