श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  2.12.105 
विनाशकामामहिताममित्रा-
मावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम्।
चिरं बताङ्केन धृतासि सर्पी
महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात्॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
हे ! तुम मेरे नाश करनेवाले हो, मेरे अहितकारी हो और मेरे शत्रु हो । जैसे कोई अपनी मृत्यु को अपने घर में स्थान देता है, वैसे ही मैंने तुम्हें अपने घर में निवास कराया है । खेद है कि मोहवश मैंने तुम्हें बहुत समय तक अपनी गोद में रखा, इसी कारण आज मैं मारा गया ॥105॥
 
‘Hey! You are my destroyer, you are my ill-wisher and you are my enemy. Just like someone gives his own death a place in his house, I have made you live in my house. It is a matter of regret that due to attachment, I have kept you in my arms for a long time; that is why I have been killed today.॥105॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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