| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना » श्लोक 104 |
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| | | | श्लोक 2.12.104  | विना हि सूर्येण भवेत् प्रवृत्ति-
रवर्षता वज्रधरेण वापि।
रामं तु गच्छन्तमित: समीक्ष्य
जीवेन्न कश्चित्त्विति चेतना मे॥ १०४॥ | | | | | | अनुवाद | | 'शायद सूर्य के बिना संसार चल जाए, भले ही वज्रधारी इन्द्र वर्षा न करें, प्राणियों के प्राण सुरक्षित रहें, परंतु राम को यहाँ से वन की ओर जाते देखकर कोई भी जीवित नहीं बच सकेगा - ऐसा मेरा विश्वास है॥104॥ | | | | 'Perhaps the world may function without the Sun, even if the thunderbolt-wielding Indra does not cause rain, the lives of creatures may remain safe, but on seeing Rama depart from here towards the forest, no one will be able to survive - this is my belief.॥ 104॥ | | ✨ ai-generated | | |
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