श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  2.12.101 
अनर्थभावेऽर्थपरे नृशंसे
ममानुतापाय निवेशितासि।
किमप्रियं पश्यसि मन्निमित्तं
हितानुकारिण्यथवापि रामे॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
हे दुष्ट कैकेयी! हे अर्थ को मिथ्या समझने वाली! मुझे कष्ट देने के लिए ही तू इस घर में आई है। हे! मेरे कारण तू अपना क्या अनिष्ट देखती है? अथवा जो श्री राम सदैव सबका कल्याण करते रहते हैं, उनमें तू कौन-सी बुराई देखती है?॥101॥
 
'O cruel Kaikeyi, who has a wrong view of the meaning of things! You have been brought to this house only to torment me. Oh! What misfortune do you see happening to you because of me? Or what evil do you see in Shri Ram, who is always doing good to everyone?॥ 101॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd