श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 119: अनसूया की आज्ञा से सीता का उनके दिये हुए वस्त्राभूषणों को धारण करके श्रीरामजी के पास आना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.119.7 
अल्पवर्णा हि तरवो घनीभूता: समन्तत:।
विप्रकृष्टेन्द्रिये देशे न प्रकाशन्ति वै दिश:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'दूर देश में जो वृक्ष मेरी इन्द्रियों को दिखाई देते हैं, वे भले ही उनमें पत्ते कम हों, परन्तु वे घने हो गए हैं और अंधकार से व्याप्त हो गए हैं; इसलिए मैं दिशाओं का बोध नहीं कर पाता।
 
'The trees that are visible to my senses in a country far away, even though they have few leaves, have become dense and pervaded by darkness; therefore I am unable to sense the directions.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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