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श्लोक 2.119.22  |
इतीरित: प्राञ्जलिभिस्तपस्विभि-
र्द्विजै: कृतस्वस्त्ययन: परंतप:।
वनं सभार्य: प्रविवेश राघव:
सलक्ष्मण: सूर्य इवाभ्रमण्डलम्॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| जब तपस्वी ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर ये वचन कहे और उन्हें शुभ यात्रा के लिए आशीर्वाद दिया, तब शत्रुओं को पीड़ा देने वाले भगवान राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में ऐसे प्रवेश कर गए, मानो सूर्यदेव बादलों के भीतर प्रवेश कर गए हों। |
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| When the ascetic Brahmins said these words with folded hands and blessed them for their auspicious journey, then Lord Rama, the tormentor of enemies, entered the forest along with His wife Sita and brother Lakshmana, as if the Sun God had entered inside a cloud of clouds. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततम: सर्ग:॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११९॥
॥ अयोध्याकाण्डं सम्पूर्णम् ॥ |
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