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ramayan 2.119.10: 'अतः अब जाओ, मैं तुम्हें जाने की अनुमति देता हूँ। जाओ और श्री रामचन्द्रजी की सेवा में लग जाओ। तुमने अपने मधुर वचनों से मुझे बहुत प्रसन्न किया है॥ 10॥   |   ramayan सर्ग 2.119: अनसूया की आज्ञा से सीता का उनके दिये हुए वस्त्राभूषणों को धारण करके श्रीरामजी के पास आना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 119: अनसूया की आज्ञा से सीता का उनके दिये हुए वस्त्राभूषणों को धारण करके श्रीरामजी के पास आना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.119.10 
गम्यतामनुजानामि रामस्यानुचरी भव।
कथयन्त्या हि मधुरं त्वयाहमपि तोषिता॥ १०॥
 
 
अनुवाद
'अतः अब जाओ, मैं तुम्हें जाने की अनुमति देता हूँ। जाओ और श्री रामचन्द्रजी की सेवा में लग जाओ। तुमने अपने मधुर वचनों से मुझे बहुत प्रसन्न किया है॥ 10॥
 
‘So now go, I give you permission to go. Go and engage yourself in the service of Shri Ramchandraji. You have made me very happy with your sweet words.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)