श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.118.8 
पाणिप्रदानकाले च यत् पुरा त्वग्निसंनिधौ।
अनुशिष्टं जनन्या मे वाक्यं तदपि मे धृतम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
‘विवाह के समय अग्नि के समीप मेरी माता ने मुझे जो शिक्षा दी थी, वह मुझे आज भी अच्छी तरह याद है।॥8॥
 
‘I still remember well the teachings my mother gave me near the fire at the time of my marriage.॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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