श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.118.6 
सकृद् दृष्टास्वपि स्त्रीषु नृपेण नृपवत्सल:।
मातृवद् वर्तते वीरो मानमुत्सृज्य धर्मवित्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
महाराज दशरथ ने जिस स्त्री को एक बार भी प्रेम से देखा है, उसे ये वीर और धर्मज्ञ प्रेममयी श्री राम अपना अभिमान छोड़कर माता के समान मानते हैं॥6॥
 
'Whichever woman Maharaja Dasharath has looked at with love even once, this brave and loving person having knowledge of Dharma, Shri Ram, leaving aside his pride, treats her like a mother.॥ 6॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas