श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.118.54 
एवं दत्तास्मि रामाय तथा तस्मिन् स्वयंवरे।
अनुरक्तास्मि धर्मेण पतिं वीर्यवतां वरम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार उस स्वयंवर में मेरे पिता ने मुझे श्री राम को सौंप दिया। धर्मानुसार मैं अपने पति श्री राम में, जो बलवानों में श्रेष्ठ हैं, सदैव अनुरक्त रहती हूँ।॥ 54॥
 
‘Thus, in that swayamvara, my father handed me over to Shri Ram. According to Dharma, I always remain attached to my husband Shri Ram, who is the best among the strong.’॥ 54॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टादशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११८॥
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas