श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.118.53 
मम चैवानुजा साध्वी ऊर्मिला शुभदर्शना।
भार्यार्थे लक्ष्मणस्यापि दत्ता पित्रा मम स्वयम्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् पिता जी ने स्वयं मेरी छोटी बहन, सती साध्वी, परम सुन्दरी उर्मिला को पत्नीरूप में लक्ष्मण के हाथों में सौंप दिया॥53॥
 
'After that, father himself handed over my younger sister, the sati sadhvi, the most beautiful Urmila, into the hands of Lakshman as his wife. 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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