श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.118.51 
दीयमानां न तु तदा प्रतिजग्राह राघव:।
अविज्ञाय पितुश्छन्दमयोध्याधिपते: प्रभो:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
‘उस समय अपने पिता अयोध्या के राजा दशरथ का अभिप्राय न जानते हुए, राजा जनक द्वारा मुझे प्रस्तुत करने पर भी भगवान राम ने मुझे स्वीकार नहीं किया॥51॥
 
‘At that time, without knowing the intention of his father, King Dasharatha of Ayodhya, Lord Rama did not accept me even when King Janaka offered me.॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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