श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.118.46 
प्रोवाच पितरं तत्र राघवौ रामलक्ष्मणौ।
सुतौ दशरथस्येमौ धनुर्दर्शनकांक्षिणौ।
धनुर्दर्शय रामाय राजपुत्राय दैविकम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
तब विश्वामित्र ने मेरे पिता से कहा, 'हे राजन! ये दोनों रघुकुलभूषण श्री राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र हैं और आपका दिव्य धनुष देखना चाहते हैं। कृपया आप अपना दिव्य धनुष राजकुमार श्री राम को दिखाइए।'॥46॥
 
‘Then Vishwamitra said to my father, ‘O King! These two Raghukulbhushan Shri Ram and Lakshman are the sons of King Dasharath and they want to see your divine bow. Please show your divine bow to Prince Shri Ram.’॥ 46॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas