श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  2.118.40 
असंचाल्यं मनुष्यैश्च यत्नेनापि च गौरवात्।
तन्न शक्ता नमयितुं स्वप्नेष्वपि नराधिपा:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
वह धनुष इतना भारी था कि मनुष्य लाख प्रयत्न करने पर भी उसे हिला नहीं सकते थे। संसार के राजा स्वप्न में भी उस धनुष को झुका नहीं सकते थे।
 
‘That bow was so heavy that men could not even move it despite their best efforts. The kings of the world were unable to bend that bow even in their dreams.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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