श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.118.4 
किं पुनर्यो गुणश्लाघ्य: सानुक्रोशो जितेन्द्रिय:।
स्थिरानुरागो धर्मात्मा मातृवत्पितृवत्प्रिय:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
फिर जब वे अपने गुणों के कारण सबके द्वारा प्रशंसा के योग्य हैं, तब उनकी सेवा करने में क्या हर्ज है? श्री रघुनाथजी अत्यंत दयालु, संयमी, दृढ़ स्नेही, गुणवान और माता-पिता के समान प्रिय हैं॥ 4॥
 
‘Then when he is worthy of everyone's praise due to his qualities, then what is there to say about serving him. Shri Raghunathji is extremely kind, self-controlled, has strong affection, is virtuous and is as dear as one's parents.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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