श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.118.38 
तस्य बुद्धिरियं जाता चिन्तयानस्य संततम्।
स्वयंवरं तनूजाया: करिष्यामीति धर्मत:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'जो महाराज मेरे विवाह के लिए सदैव चिन्तित रहते थे, उनके मन में एक दिन यह विचार आया कि मैं धर्मानुसार अपनी पुत्री का स्वयंवर करूँगा।॥ 38॥
 
'One day the thought came to the mind of that Maharaja who was always worried about my marriage that I will perform a swayamvara for my daughter as per the Dharma.॥ 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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