श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.118.35 
सदृशाच्चापकृष्टाच्च लोके कन्यापिता जनात्।
प्रधर्षणमवाप्नोति शक्रेणापि समो भुवि॥३५॥
 
 
अनुवाद
'इस संसार में कन्या का पिता, चाहे वह पृथ्वी पर इन्द्र के समान ही क्यों न हो, वर पक्ष के लोगों से प्रायः अपमान सहना पड़ता है, चाहे वे उसके समान हों या उससे निम्न स्तर के हों॥ 35॥
 
'In this world, the father of a daughter, even if he is equal to Indra on earth, often has to bear insult from the people of the groom's side, whether they are of equal or lower status than him.॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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