श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.118.34 
पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता।
चिन्तामभ्यगमद् दीनो वित्तनाशादिवाधन:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
‘जब मेरे पिता ने देखा कि मेरा विवाह हो रहा है, तब वे इसके लिए बहुत चिंतित हो गए। जैसे निर्धन मनुष्य अपना कमाया हुआ धन नष्ट हो जाने पर बहुत दुःखी होता है, उसी प्रकार वे मेरे विवाह की चिंता से बहुत दुःखी हो गए॥ 34॥
 
‘When my father saw that I was getting married, he became very worried about it. Just as a poor man is very sad when his earned money is lost, in the same way he became very sad with the worry of my marriage.॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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