श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  2.118.21-22 
सा वस्त्रमङ्गरागं च भूषणानि स्रजस्तथा।
मैथिली प्रतिजग्राह प्रीतिदानमनुत्तमम्॥ २१॥
प्रतिगृह्य च तत् सीता प्रीतिदानं यशस्विनी।
श्लिष्टाञ्जलिपुटा धीरा समुपास्त तपोधनाम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
अनसूया की आज्ञा से धैर्यवान एवं यशस्वी मिथिला राजकुमारी सीता ने उन वस्त्रों, सुगन्धित द्रव्यों, आभूषणों और हारों को अपनी प्रसन्नता का सर्वोत्तम उपहार मानकर स्वीकार कर लिया। उस प्रेमपूर्ण उपहार को स्वीकार करने के पश्चात् वे तपस्विनी अनसूया की सेवा में हाथ जोड़कर बैठ गईं।
 
By the order of Anasuya, the patient and famous Mithila princess Sita accepted those clothes, perfumes, ornaments and necklaces as the best gift of her happiness. After accepting that loving gift, she sat with folded hands in the service of the ascetic Anasuya.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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