श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.118.20 
अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे।
शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीर्विष्णुमव्ययम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'जानकीशोरी! इस दिव्य सौन्दर्य को अपने शरीर के अंगों पर लगाकर तुम अपने पति को उसी प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अमर भगवान विष्णु को सुशोभित करती हैं।
 
‘Janakishori! By applying this divine beauty on your body parts, you will beautify your husband in the same way as Lakshmi beautifies the immortal Lord Vishnu.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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