श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  2.118.18-19 
इदं दिव्यं वरं माल्यं वस्त्रमाभरणानि च।
अङ्गरागं च वैदेहि महार्हमनुलेपनम्॥ १८॥
मया दत्तमिदं सीते तव गात्राणि शोभयेत्।
अनुरूपमसंक्लिष्टं नित्यमेव भविष्यति॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'मैं तुम्हें यह सुंदर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण, ये सुगंधियाँ और बहुमूल्य मलहम देता हूँ। हे विदेहपुत्री सीता! मेरी दी हुई ये वस्तुएँ तुम्हारे शरीर की शोभा बढ़ाएँगी। ये सभी तुम्हारे लिए उपयुक्त हैं और इनके प्रयोग से सदैव दोषरहित और निष्कलंक रहेंगी।'
 
'I give you this beautiful divine necklace, this cloth, these ornaments, these perfumes and precious ointments. O daughter of Videha, Sita! These things given by me will enhance the beauty of your body. All these are suitable for you and will always remain flawless and unblemished when used.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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