श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 118: सीता-अनसूया-संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.118.14 
नियमैर्विविधैराप्तं तपो हि महदस्ति मे।
तत् संश्रित्य बलं सीते छन्दये त्वां शुचिव्रते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे उत्तम व्रतों का पालन करने वाली सीता! मैंने अनेक प्रकार के नियमों का पालन करके बहुत अधिक तप संचित किया है। उस तप शक्ति का आश्रय लेकर मैं तुमसे अपनी इच्छानुसार वर माँगने के लिए कहता हूँ॥ 14॥
 
'O Sita, one who observes the best fasts! I have accumulated a lot of penance by following many types of rules. Taking shelter in that austerity power, I ask you to ask for a boon of your choice.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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