श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 117: श्रीराम आदि का अत्रिमुनि के आश्रम पर जाकर उनके द्वारा सत्कृत होना तथा अनसूया द्वारा सीता का सत्कार  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.117.29 
तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती
पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी।
भव स्वभर्तु: सहधर्मचारिणी
यशश्च धर्मं च तत: समाप्स्यसि॥ २९॥
 
 
अनुवाद
"इसलिए तुम भी इसी प्रकार अपने पति भगवान राम की सेवा करती रहो - पतिव्रता धर्म का पालन करो, अपने पति को अपना परम पूज्य मानो, सदैव उनकी आज्ञा का पालन करो और अपने पति की पत्नी बनो। इससे तुम्हें यश और धर्म दोनों की प्राप्ति होगी।" ॥29॥
 
"Therefore, continue to serve your husband, Lord Rama, in the same manner - follow the path of chastity, consider your husband as your supreme deity, obey him all the time and become the wife of your husband. By this you will attain both fame and religion." ॥29॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११७॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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