श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 117: श्रीराम आदि का अत्रिमुनि के आश्रम पर जाकर उनके द्वारा सत्कृत होना तथा अनसूया द्वारा सीता का सत्कार  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.117.17 
सीता त्वेतद् वच: श्रुत्वा राघवस्य यशस्विनी।
तामत्रिपत्नीं धर्मज्ञामभिचक्राम मैथिली॥ १७॥
 
 
अनुवाद
श्री राम के ये वचन सुनकर मिथिला की प्रतापी पुत्री सीता, धर्म जानने वाली अत्रि की पत्नी अनसूया के पास गईं।
 
On hearing these words of Sri Rama, the glorious daughter of Mithila, Sita, went to Anasuya, the wife of Atri, who knew the Dharma.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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