श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.116.7 
कच्चिच्छुश्रूषमाणा व: शुश्रूषणपरा मयि।
प्रमदाभ्युचितां वृत्तिं सीता युक्तां न वर्तते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'अथवा जो सीता सदैव अर्घ्य और पाद्य देकर आप सबकी सेवा करती आई है, वह मेरी सेवा में लगी रहने के कारण गृहस्थ पतिव्रता स्त्री के योग्य ऋषियों की सेवा भी ठीक प्रकार से नहीं कर पाती?'॥7॥
 
'Or, is that Sita who has always been serving you all by offering arghya (water offerings) and padya (foot-wash), unable to serve the sages properly in a manner befitting a chaste woman of a householder, because she is now engaged in my service?'॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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