श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.116.5 
न कश्चिद् भगवन् किंचित् पूर्ववृत्तमिदं मयि।
दृश्यते विकृतं येन विक्रियन्ते तपस्विन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! क्या मुझे पहले के राजाओं जैसा कोई आचरण नहीं दिखाई देता अथवा मेरे मन में कोई विकृत भावना है, जिसके कारण यहाँ के तपस्वी ऋषिगण विकृत हो रहे हैं?॥5॥
 
'O Lord! Do I not see any behaviour like that of the previous kings or do I have any perverted feelings, due to which the ascetic sages here are getting perverted? ॥ 5॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas