श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.116.4 
तेषामौत्सुक्यमालक्ष्य रामस्त्वात्मनि शङ्कित:।
कृताञ्जलिरुवाचेदमृषिं कुलपतिं तत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उनकी उत्सुकता देखकर श्री रामचन्द्रजी के मन में यह संदेह हुआ कि कहीं इनसे कोई अपराध तो नहीं हो गया। तब वे हाथ जोड़कर कुलगुरु महर्षि से इस प्रकार बोले-॥4॥
 
Seeing their eagerness, Shri Ramchandraji had a doubt in his mind that he might have committed some crime. Then with folded hands he spoke to the Vice Chancellor Maharshi in this manner -॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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