श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.116.25 
राम: संसाध्य ऋषिगणमनुगमनाद्
देशात् तस्मात् कुलपतिमभिवाद्य ऋषिम्।
सम्यक्प्रीतैस्तैरनुमत उपदिष्टार्थ:
पुण्यं वासाय स्वनिलयमुपसम्पेदे॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ से जाते हुए ऋषियों के पीछे-पीछे जाकर उन्हें विदा करके उन्होंने कुलपति ऋषि को प्रणाम किया और अत्यंत प्रसन्न हुए। उन ऋषियों से आज्ञा लेकर और उनके कर्तव्य-विषयक उपदेश सुनकर वे लौटकर अपने पवित्र आश्रम में आकर रहने लगे॥ 25॥
 
After following the sages who were leaving from there and bidding them farewell, he bowed to the Kulapati Rishi and was extremely pleased. After taking permission from those sages and listening to their advice on duties, he returned and came to his holy hermitage to reside there.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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