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श्लोक 2.116.22  |
सकलत्रस्य संदेहो नित्यं युक्तस्य राघव।
समर्थस्यापि हि सतो वासो दु:खमिहाद्य ते॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| 'रघुनन्दन! यद्यपि आप सदैव सावधान रहते हैं और राक्षसों को दबाने में समर्थ हैं, तथापि इन दिनों उस आश्रम में आपका अपनी पत्नी के साथ रहना संदिग्ध और दुःखदायी है।'॥22॥ |
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| 'Raghunandan! Although you are always cautious and capable of subduing the demons, yet your stay with your wife in that ashram these days is doubtful and painful.'॥ 22॥ |
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