श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.116.20 
बहुमूलफलं चित्रमविदूरादितो वनम्।
अश्वस्याश्रममेवाहं श्रयिष्ये सगण: पुन:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर एक विचित्र वन है, जहाँ फल-मूल प्रचुर मात्रा में हैं। वहाँ अश्वमुनि का आश्रम है, अतः मैं ऋषियों के समूह को साथ लेकर पुनः उसी आश्रम में आश्रय लूँगा।
 
‘There is a strange forest at a short distance from here, where there is abundance of fruits and roots. There is the Ashvamuni Ashram, so taking along with me a group of sages, I will again take shelter in that Ashram.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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