श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.116.18 
तैर्दुरात्मभिराविष्टानाश्रमान् प्रजिहासव:।
गमनायान्यदेशस्य चोदयन्त्यृषयोऽद्य माम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'आज ये ऋषिगण मुझे अन्यत्र जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, ताकि मैं दुष्टात्मा राक्षसों से भरे हुए आश्रमों का परित्याग कर दूँ॥18॥
 
'Today these sages are persuading me to go to some other place, in order to abandon the ashrams which have been infested with evil-minded demons.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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