श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.116.17 
अवक्षिपन्ति स्रुग्भाण्डानग्नीन् सिञ्चन्ति वारिणा।
कलशांश्च प्रमर्दन्ति हवने समुपस्थिते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'जब होम-विधि प्रारंभ होती है, तब वे स्रुक-स्रुवा आदि यज्ञ सामग्री इधर-उधर फेंकते हैं। वे जलती हुई अग्नि पर जल डालते हैं और मटकियाँ फोड़ते हैं।
 
‘When the homam ceremony begins, they throw the sacrificial materials like sruk-sruva etc. here and there. They pour water on the burning fire and break the pots.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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