श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.116.16 
तेषु तेष्वाश्रमस्थानेष्वबुद्धमवलीय च।
रमन्ते तापसांस्तत्र नाशयन्तोऽल्पचेतस:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'वह अज्ञात रूप धारण करके इन आश्रमों में आकर वहाँ छिप जाता है और अज्ञानियों तथा असावधानों के दुःखों का नाश करते हुए सुखपूर्वक विचरण करता है।॥16॥
 
'He comes to these ashrams in an unknown form and hides himself there and roams there happily, destroying the sufferings of the ignorant and the unwary.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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