श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 116: वृद्ध कुलपति सहित बहुत-से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.116.10 
त्वन्निमित्तमिदं तावत् तापसान् प्रति वर्तते।
रक्षोभ्यस्तेन संविग्ना: कथयन्ति मिथ: कथा:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारे कारण ही तपस्वियों पर राक्षसों का यह भय उत्पन्न होने वाला है। इससे व्याकुल होकर ये ऋषिगण आपस में कुछ कानाफूसी कर रहे हैं॥10॥
 
'It is because of you that this fear from the demons is going to arise upon the ascetics. The sages, perturbed by this, are whispering something amongst themselves.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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