श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 115: भरत का नन्दिग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदन पूर्वक राज्य का सब कार्य करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.115.16 
छत्रं धारयत क्षिप्रमार्यपादाविमौ मतौ।
आभ्यां राज्ये स्थितो धर्म: पादुकाभ्यां गुरोर्मम॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तुम सब लोग इन चरणचिह्नों पर छाता धारण करो। मैं इन्हें आर्य रामचंद्रजी के साक्षात चरणचिह्न मानता हूँ। मेरे गुरु के इन चरणचिह्नों से ही इस राज्य में धर्म की स्थापना होगी।॥16॥
 
‘All of you should hold umbrellas over these footprints. I consider these to be the actual feet of Arya Ramchandraji. Dharma will be established in this kingdom only through these footprints of my Guru.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)